
धर्म (Dharma): धर्म एक बहुत व्यापक और गहरा शब्द है। यह केवल किसी एक पूजा पद्धति या मजहब तक सीमित नहीं है। इसका अर्थ होता है:
- कर्तव्य और दायित्व: धर्म का मूल अर्थ है ‘धारण करना’ या ‘जो धारण किया जाए’। यह उन कर्तव्यों, जिम्मेदारियों और नैतिक सिद्धांतों को दर्शाता है जिन्हें व्यक्ति को अपने जीवन में धारण करना चाहिए। जैसे, राजधर्म (राजा का कर्तव्य), पितृधर्म (पिता का कर्तव्य), पुत्रधर्म (पुत्र का कर्तव्य), राष्ट्रधर्म (राष्ट्र के प्रति कर्तव्य) आदि।
- सार्वभौमिक नियम: धर्म उन सार्वभौमिक नियमों और सिद्धांतों को भी संदर्भित करता है जो ब्रह्मांड और मानव समाज को व्यवस्थित रखते हैं। ये शाश्वत मूल्य होते हैं, जैसे सत्य, अहिंसा, न्याय, करुणा, ईमानदारी, दान, संयम आदि।
- जीवन जीने का तरीका: धर्म का अर्थ एक श्रेष्ठ और न्यायपूर्ण जीवन जीने का तरीका है, जिसमें व्यक्ति अपने आचरण और व्यवहार को सामाजिक और नैतिक रूप से स्थापित नियमों के अनुसार रखता है। यह व्यक्ति के नैतिक और आध्यात्मिक विकास पर केंद्रित होता है।
- उदाहरण: सनातन धर्म (जिसे अक्सर ‘हिंदू धर्म’ के रूप में जाना जाता है) वास्तव में एक जीवन पद्धति और शाश्वत नियमों का समुच्चय है, न कि केवल एक पंथ।

पंथ (Panth): पंथ शब्द का अर्थ अधिक संकीर्ण और विशिष्ट होता है। यह दर्शाता है
- मार्ग या रास्ता: पंथ का शाब्दिक अर्थ है ‘रास्ता’ या ‘मार्ग’। यह किसी विशेष विचारधारा, मत या परंपरा को मानने वाले लोगों का समूह होता है।
- विशिष्ट सिद्धांत और आचार: पंथ में एक विशेष गुरु या संस्थापक द्वारा दिए गए कुछ निश्चित सिद्धांत, आचार-विचार और अनुष्ठान होते हैं। ये नियम अक्सर उस पंथ के अनुयायियों के लिए विशिष्ट होते हैं।
- एक धर्म के भीतर: कई बार, एक बड़े धर्म के भीतर ही अलग-अलग पंथ या संप्रदाय होते हैं। उदाहरण के लिए, हिंदू धर्म के भीतर शैव पंथ, वैष्णव पंथ, शाक्त पंथ आदि प्रमुख पंथ हैं। सिख धर्म भी एक पंथ से विकसित होकर एक स्वतंत्र धर्म बना।
- उदाहरण: ईसाई धर्म (क्रिश्चियन पंथ), इस्लाम (इस्लामिक पंथ), बौद्ध धर्म (बौद्ध पंथ), जैन धर्म (जैन पंथ) आदि को आमतौर पर ‘पंथ’ या ‘मजहब’ कहा जा सकता है, क्योंकि वे विशिष्ट संस्थापक, नियमों और परंपराओं पर आधारित हैं।

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।” (जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ) और “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।” (कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, फल में कभी नहीं।
सनातन का अर्थ है शाश्वत या हमेशा बना रहने वाला अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त। ‘ जैसे भगवान शाश्वत ( सनातन) हैं, ऐसे ही सनातन धर्म भी शाश्वत है। भगवान ने तो सनातन धर्म को अपना स्वरूप बताया है । ब्राह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्म च शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च । ।


